अपनी शिक्षा को व्यावहारिकता से जोड़े

अपनी शिक्षा को व्यावहारिकता से जोड़े

कम पढ़े-लिखे लोग कुछ मामले में सुखी रहते हैं। उनके अपने जो दुख हैं, वैसे ही संताप ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों के जीवन में भी हैं। फिर शिक्षा का फर्क क्या रहा? बहुत से शिक्षित लोगों को परेशानी की स्थिति में यह टिप्पणी करते सुना है कि ऊंची शिक्षा ने हमारी परेशानियां बढ़ा दीं। शिक्षा से जो स्पष्टता प्राप्त होनी थी वह तो दूर, उल्टा भ्रम बढ़ा गई। इससे तो कम पढ़े-लिखे होते तो ठीक होता। इन दिनों ऐसा ही सच बहुत से पढ़े-लिखे लोगों के जीवन में चल रहा है। उनका कहना है शिक्षा ने हमारी पद-प्रतिष्ठा तो बढ़ा दी लेकिन, यह नहीं बता पाई कि ज़िंदगी में करना क्या है? किसी बात पर पढ़े-लिखे आदमी के विचार कम पढ़े-लिखे के मुकाबले अधिक तेजी से दौड़ते हैं। ये विचार जब भीतर टकराने लगते हैं तो आदमी और अशांत हो जाता है। कम पढ़े-लिखे लोग कम सोचते हैं, इसलिए विपरीत समय में जल्दी बाहर निकल आते हैं। पढ़े-लिखे की उलझन बड़ी गहरी होती है। बहुत से तो ज़िंदगीभर इसी में उलझे रहते हैं कि हमें हमारी योग्यता से कम मिल रहा है। यही उनके असंतोष का कारण बन जाता है।

इसलिए शिक्षित व्यक्ति को अपने विचारों पर नियंत्रण रखते हुए उन्हें शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिकता से भी जोड़ना चाहिए। कई पढ़े-लिखे लोग व्यावहारिक नहीं होते। ऊंचे पद पर होते हैं पर जमीनी जिंदगी को नहीं जान पाते। यदि व्यवहार जमीन से जुड़ा है तो विचार भी परिपक्व होंगे और परिपक्व विचार शिक्षित व्यक्ति को अशांति से बचा ले जाएंगे।

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