अहंकार से बचाता है ईश्वर के प्रति समर्पण

अहंकार से बचाता है ईश्वर के प्रति समर्पण

यदि आप लगातार लोगों को ज्ञान बांटते रहें और लोग उसे स्वीकार भी कर लें तो एक दिन उनके मन में यह जरूर आएगा कि जो व्यक्ति ज्ञान बांट रहा है उसने इसे अपने जीवन में भी कभी उतारा होगा या नहीं? कई लोग मुझसे भी बहुत सारे प्रश्न पूछते हैं। मैं उन सबको मिलाकर एक उत्तर बना लेता हूं। इसी का नाम जीने की राह है। पिछले कुछ दिनों से तो लगातार यह सवाल पूछा जा रहा है कि आप जो भी ज्ञान देते हैं, उसके प्रयोग स्वयं ने कभी किए हैं? प्रश्न बड़ा सार्थक है। मैं सोचता रहा और एक घटना घट गई। पिछले दिनों मैं कहीं कथा कर रहा था और किसी बात पर मैंने आयोजकों से कुछ ऐसा कह दिया जो मेरे स्वभाव के विपरीत है। मेरी आवेशित वाणी सुनकर वे चकित होकर चले गए। उसके बाद मुझे पश्चाताप हुआ और मैंने मोबाइल पर मैसेज भेजकर उनसे क्षमा मांग ली। उन्होंने तुरंत पलटकर मेरी तारीफ करते हुए कहा- आप जैसे व्यक्ति का माफी मांगना हमारे लिए शर्म की बात है। कुल-मिलाकर मेरा माफी मांगना, मेरा पश्चाताप भी मेरे अहंकार को बढ़ाने लगा। बड़ा मुश्किल होता है खुद को अहंकार से बचाना।

हनुमानजी के जीवन में जब श्रीराम ने उनकी प्रशंसा की तो उन्होंने पहला काम किया कि भगवान के चरणों में गिर गए। उस दिन मुझे भी लगा परमात्मा के चरणों में माथा रखने के अलावा अहंकार गिराने का दूसरा कोई साधन नहीं है। तो जब भी ऐसा अवसर आए, खुद को भगवान के चरणों में अर्पित कर दीजिए, बाकी काम भगवान निपटा लेंगे..।

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