खुद का शत्रु बनने से होता है बड़ा नुकसान

आपका दुश्मन आपको नुकसान जरूर पहुंचाएगा। ज़िंदगी में थोड़े-बहुत दुश्मन सभी के होते हैं, इसलिए हमें सिखाया जाता है कि आपके शत्रु कौन हैं, इसे लेकर चौकन्ने रहें। लेकिन, कभी विचार किया है कि आप स्वयं भी अपने दुश्मन हो सकते हैं। जब आदमी खुद का दुश्मन होता है तो उसे पता भी नहीं चलता और नुकसान होता जाता है। दो रास्ते पर चलकर मनुष्य खुद से दुश्मनी करता है- पहला होता है भोग-विलास का। आप खुद को भोग-विलास में डालकर शरीर का नुकसान करते हैं, चरित्र को गिरा लेते हैं, अशांति को आमंत्रण दे बैठते हैं और फिर परेशान होते हैं कि इस सबसे मुक्ति कैसे पाई जाए? भोग-विलास में गिरने का मतलब ही है कि व्यक्ति ने खुद से दुश्मनी शुरू कर दी। दूसरा रास्ता होता है संयम का। जब आप संयम की अति करते हैं तो भी परेशानी में पड़ जाते हैं। कुछ लोग भक्ति में अति कर इतने उपवास कर लेते हैं कि वह महंगा पड़ जाता है। कोई सच बोलने की अति कर जाता है, कोई परिश्रम की अति पर उतर जाता है। ध्यान रखें, अति तो हर बात की बुरी होती है। यदि भोग-विलास की अति की तो भी आप अपने दुश्मन हैं और संयम की अति करके भी स्वयं के शत्रु हैं। जीवन जिस संतुलन का नाम है, वह यदि साध लिया तो आप खुद के दुश्मन नहीं बनेंगे। सावधान रहें, बाहर के शत्रु तो आप पहचान लेंगे, पर जब खुद को अपना शत्रु बना लेते हैं तो पहचानना मुश्किल हो जाता है और तब स्वयं का बड़ा नुकसान कर लेते हैं..।

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