खुशी की तलाश सिर्फ धन में ही करने की गलती से बचें

खुशी की तलाश सिर्फ धन में ही करने की गलती से बचें

दौलत से कभी कोई इंसान तृप्त नहीं हो पाया। इस दुनिया में संतुष्टि के बहुत रास्ते हैं। बहुत सारे ऐसे काम, ऐसी वस्तुएं हैं जो आपको थोड़ा-बहुत तृप्त कर सकती हैं, संतोष प्रदान कर सकती हैं। लेकिन, धन के साथ एक बात है कि जब वह आता है तो चिंता, व्यस्तता और अपने खर्च के रास्ते तीनों साथ लेकर आता है। जैसे ही धन आया, वह थोड़ी-सी चिंता भी दे देता है। कई बार नींद भी उड़ जाती है और फिर धन इतना व्यस्त कर देता है कि धनवान आदमी अपनों से ही कट जाता है। फिर एक लालसा पैदा कर देता है मुझे और बढ़ाओ..। इस चक्कर में आदमी अपना ईमान भी खराब करने लगता है। इसलिए शास्त्रों ने कहा है धन एक साधन है, साध्य नहीं। धन एक क्रिया है, लेकिन इसे पूर्ण परिणाम न मानें। धन मेरे लिए है, क्योंकि मैं मनुष्य हूं, लेकिन मैं धन के लिए हो जाऊं यहां से झंझट शुरू हो जाएगी। जैसे शरीर को संवारना, भोगना, खिलाना ये सब जरूरी हो जाता है, ऐसे ही धन के साथ कुछ बातें जरूरी हो जाती हैं। दान देकर धन को भी संवारना पड़ता है, धन को भी भोगना पड़ता है, वरना उसका नाश हो जाएगा। धन की अपनी भूख है जो सेवा से मिटेगी। इसलिए यदि इन सब बातोंं को नहीं समझा तो धन आपको धनवान तो बना देगा, पर नाखुश भी कर देगा। बेशक खुशी की तलाश धन में भी की जानी चाहिए, पर धन से ही की जाए यह गलती कभी न करें..।

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