गुरु के साथ विद्या को जीवन में उतारें

गुरु के साथ विद्या को जीवन में उतारें

आगे आने वाला समय पूरी तरह शिक्षा का होगा। बिना पढ़े-लिखे लोग सम्मान से दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाएंगे। विद्या की देवी को वसंत पंचमी पर याद किया जाता है, पूजा जाता है। वे शब्द और वाणी दोनों प्रदान करती हैं। लेकिन, केवल मां सरस्वती से जुड़ने से ही काम नहीं चलेगा। विद्या तो वे दे देंगीं लेकिन, विद्या के साथ जिस विवेक की जरूरत है, उसके लिए गुरु चाहिए। गुरु शिक्षा को निरहंकारिता से जोड़ते हुए एक शिक्षित व्यक्ति को यह समझा देता है कि अपने ज्ञान, अपनी योग्यता का सदुपयोग कैसे किया जाए। हमारे फकीरों ने गलत नहीं कहा है कि गुरु एक दर्पण की तरह है। इसे साधारण आईना न मान लें। दर्पण का एक खास अर्थ है। जिसे देखकर मन में दर्प हो जाए कि हम बहुत सुंदर हैं, वह होता है दर्पण। लेकिन, उस दर्पण और गुरुरूपी दर्पण में बड़ा फर्क है। एक साधारण दर्पण आपके अहंकार को बढ़ाता है और गुरुरूपी दर्पण अहंकार को गिराता है। आईने का एक और अर्थ है- यथावत प्रतिबिंबित कर दिया जाए। आप जैसे हैं, आईना वैसा ही दिखाता है। गुरु इस मामले में बिल्कुल दर्पण की तरह हो जाता है। इस गुरुरूपी दर्पण की रुचि यहीं से आरंभ होती है कि अब तुम देख चुके हो कि हो क्या..। यदि गलत हो तो मैं इशारा करता हूं कि सही हो जाओ और सही हो तो सजग करता हूं कि अहंकार मत पालो। इसलिए विद्या की देवी सरस्वती जीवन में उतरे, लेकिन किसी गुरु के साथ। गुरुरूपी दर्पण जीवन की तस्वीर को बहुत सुंदर बना देता है..।

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