जीवन में खुश रहना है तो अपने कर्मों के दर्शक बनें

हमने अपनी दुनिया बसाई, मेहनत कर धन कमाया। बच्चों को इसलिए पढ़ा-लिखा रहे हैं कि उनके पास भी वह सब हो जो हमारे पास है। साथ ही जो हम अर्जित नहीं कर पाए, वह उनको जरूर मिले। इस परिश्रम का अर्थ है भौतिक जीवन में मनोवांछित की प्राप्ति हो जाए। हम इन्सान हैं और इन्सान ही अपना संसार बसा सकता है, पशु को तो यह स्वतंत्रता है नहीं। मनुष्य के जीवन और जंगलराज में यही तो फर्क है कि मनुष्य व्यवस्थित होकर जो चाहे कर सकता है, प्राप्त कर सकता है। लेकिन, होता क्या है कि जब आदमी भौतिक संसाधनों में उलझता है तो सीमा तय नहीं कर पाता। वह ये भी मिल जाए, उसे भी हासिल कर लूं.. में लग जाता है। नतीजे में मिल क्या रहा है, इसका लेखा तो रखता है पर हो क्या रहा है, इसका हिसाब नहीं रखता। यदि आपके साथ भी ऐसा हो रहा है तो एक बात अपने आपको बहुत अच्छे से समझाइए कि मनुष्य की मूल चेतना आध्यात्मिक है और यही चेतना उसे भौतिक दुनिया के तनाव से बाहर निकाल सकती है। जैसे ही अपनी आध्यात्मिक चेतना पर टिकते हैं, यह सबसे पहले आपको होश देती है। यानी जो भी काम आप कर रहे होंगे, खुद ही दूर रहकर उसे देख सकेंगे। तो आप इन्वॉल्व तो हैं, लेकिन इसी के साथ दर्शक भी हैं। यह जो दूरी है, इसी में छिपी है आपकी खुशी। जितना निकट जाएंगे उतने उलझेंगे। इसी का नाम दुख है। जीवन में खुश रहना हो तो अपने ही दर्शक खुद बन जाएं।

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