दूसरे के अप्रिय शब्दों को प्रेम से ठुकरा दें

अपने सोचे हुए और दूसरों के शब्दों को सुनने का बोझ इन्सान ज़िंदगीभर उठाकर घूमता है। आप किसी की जुबान नहीं पकड़ सकते। कोई आपकी प्रशंसा करे या आलोचना, उस पर आपका कोई वश नहीं। अगर आलोचना हो रही हो, सामने वाला आपको दुर्वचन कह रहा हो तो सावधानी से बचिएगा वरना यह बोझ बनकर आपकी ज़िंदगी की चाल को लड़खड़ा देगा। लंका कांड में युद्ध के दौरान रावण का बेटा मेघनाद लड़ते-लड़ते श्रीराम के पास पहुंच गया और उन्हें देखकर दुर्वचन कहने लगा। इस दृश्य पर तुलसीदासजी ने लिखा- ‘रघुपति निकट गयउ घननादा। नाना भांति करेसि दुर्बादा।। मेघनाद ने श्रीराम के पास जाकर अलग-अलग प्रकार से दुर्वचनों का प्रयोग किया। कटुवचन, गालियां, अप्रिय वाणी अपने आप में शस्त्र ही होते हैं। कुछ लोग इन्हीं से प्रहार करते हैं लेकिन, रामजी बड़े धैर्यवान थे। मेघनाद ने जो-जो कहा, धीरज के साथ सुना और मुस्कुरा दिए। तुम गाली बक रहे हो, यह तुम्हारा अधिकार है, हम उसे लें, न लें, यह हमारा अधिकार है। यदि हमने किसी के दुर्वचन स्वीकार नहीं किए तो पलटकर उसी के पास जाना हैं। नतीजा यह होगा कि ‘देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना। करै लाग माया बिधि नाना।। श्रीराम का प्रताप देख मूर्ख मेघनाद लज्जित होकर भांति-भांति से माया करने लगा। इस घटना से रामजी सिखा गए कि यदि कोई अप्रिय शब्द बोल रहा हो तो उन्हें स्वीकार न करें। यानी दिल पर मत लेना प्रेम से अस्वीकृति बना देना। बस, सामने वाला मेघनाद की तरह लज्जित हो जाएगा..।

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