नातों की गहराई देती है मनुष्यता का आनंद

Portrait of family

हर रिश्ता एक दर्पण है। जैसे आईने में देखकर हम अपना चेहरा, अपनी छवि ठीक करते हैं, उसे संवारते हैं। कुल-मिलाकर अपने आपको संवारने के लिए आईना काम आता है। ऐसे ही रिश्तों को भी संभालना पड़ता है, संवारना पड़ता है। रिश्तों के साथ एक शब्द और जुड़ा है- नाता। रिश्ते हम बनाते हैं। संसार में रहते हुए हम अनेक लोगों से संपर्क में आते हैं। वो परिवार के दायरे के लोग भी हो सकते हैं, कारोबार-समाज से जुड़े भी हो सकते हैं। उनके साथ रिश्तों का निर्माण और उन्हें सतत निभाने में सावधानी हमें ही रखनी पड़ती है, परंतु नाता भगवान बनाते हैं। हमारे, माता-पिता, बच्चे, भाई-बहन और बाकी रिश्तेदार, ये सब नातेदारी है। आप किनके बच्चे होंगे, आपके भाई-बहन, बच्चे कौन होंगे यह आप तय नहीं कर सकते। यह संसार में आने के बाद पता लगता है। तो भगवान नाता बनाकर भेजता है। एक संबंध ऐसा है, जिसमें शुरुआत रिश्ते से होती है, पर होता नाता है और वह है पति-पत्नी का। पत्नी के चयन में पुरुष सावधानी रखता है, पति के चयन में स्त्री भी समझ रखती है। यहां बनाया रिश्ता जाता है, लेकिन जब निभाने का अवसर आए तो फिर उसमें नाता नज़र आएगा, क्योंकि कहीं न कहीं यह डोर ऊपर वाले ने जोड़ रखी है। इसलिए हर रिश्ता-नाता दर्पण हो जाता है। सदैव उसे देखते रहें और अपनी मनुष्य आकृति को ठीक करते रहें। जो लोग रिश्तों की गंभीरता और नातों की गहराई जानते हैं, उनके लिए मनुष्य होने का आनंद भी बढ़ आएगा।


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