जीवन को बना या बिगाड़ सकता है मन

खिचड़ी अधपकी हो तो रसोइये का महत्व और बढ़ जाता है। समझदार लोग आधे भोजन में रसोइये से झगड़ा नहीं करते, क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि इसे पूरा वही बना सकता है। देश में कई बार ऐसी स्थिति हो जाती है। हो सकता है इस वाक्य को लोग राजनीतिक दृष्टि से देखें कि देश इस समय अधपकी खिचड़ी की तरह है। तो क्या रसोइया बदलने से खतरा हो सकता है? पुराने संत-महात्मा कहा करते थे कि अधपकी खिचड़ी और रसोइये का मतलब है हमारा जीवन और हमारा मन। मन एक ऐसे रसोइये की तरह है, जो जानता है कि भोजन को उस स्थिति में ले आओ कि फिर कोई रसोइये को बदल न सके। इसीलिए वह अपने भीतर नए-नए पकवान बनाता है और इतना उलझा देता है कि आप छोड़ भी नहीं सकते। मन को ऐसे-ऐसे निर्णय लेने की आदत है कि कोई सोच भी नहीं सकता। फिर यही आपकी ताकत भी बन जाता है और यही कमजोरी भी। इसलिए मन के प्रति सावधान रहिए। वह जो निर्णय ले उसे बुद्धि से देखिए, क्योंकि मन जानता है मुझसे जुड़े लोगों को कमजोर कैसे करना..। आपकी कमजोरी उसकी ताकत बन जाती है। कुल-मिलाकर मन उस रसोइये की तरह है, जो आपका भोजन और उसका स्वाद बिगाड़ भी सकता है, बना भी सकता है। किसी भी दृष्टि से देखें, भोजन तो अधपका है पर रसोइये से आपकी हैंडलिंग कैसी है, उसका स्वाद और रस इस पर टिकेगा। इसे पूरे जीवन से जोड़कर देखिए और मन के मामले में सावधान रहिए…।

X