भीतर का देवत्व दुखी हो तो हम गलत हैं

हम जो भी काम करते हैं वह सही है या गलत इसका मापदंड एक तो हम स्वयं हो सकते हैं और दूसरे वे लोग जो हमारे नज़दीकी हैं, हितैषी हैं। हमारे शास्त्रों में देवताओं को पुण्य माना है। जो बहुत अधिक अच्छे काम करता है, पुण्य में जीता है, उसे देवत्व प्राप्त होता है। दरअसल, हम उस समय देवता हो जाते हैं जब नीतिगत रहकर रीति से अच्छे काम करते हैं। उस समय हमारे ही भीतर का देवता हमें देखकर खुश होता है और गलत काम करते देख दुखी होता है। श्रीराम और रावण के युद्ध में दोनों सेनाओं की भिड़ंत पर तुलसीदासजी ने लिखा- देखहिं कौतुक नभ सुर बृंंदा। कबहॅुक बिसमय कबहुॅ अनंदा।। आकाश से देवतागण यह कौतुक देख रहे थे। उन्हें कभी खेद होता, कभी आनंद मिलता। इस बात पर ध्यान दीजिए। कभी खेद, कभी आनंद। हमारे भीतर का देवत्व हमारी गतिविधियां देखकर कभी खुश होता है, कभी दुखी हो जाता है। अगर वह खुश है तो समझ लीजिए आप अच्छे काम कर रहे हैं और यदि उस देवत्व को दुख पहुंच रहा है तो समझो गलत राह पर चल रहे हैं। इसलिए आप सही हैं या गलत, इसका निर्णय भी सबसे अच्छा आप ही कर सकते हैं। जैसे दुनिया में न तो पुरानी चीज बेकार होती है, न ही नई चीज नकारी जाना चाहिए। दोनों की अपने-अपने समय पर उपयोगिता है, लेकिन वह कितना उपयोगी है, यह तय आप करेंगे। केवल नई होने से अच्छी है, पुरानी होने से खराब है, ऐसा नहीं माना जा सकता। तो अपने ही देवत्व से तय कराइए, फिर सही और गलत करिएगा…।

X