भीतर होश जागे, यही शिक्षा का उद्‌देश्य

भीतर होश जागे, यही शिक्षा का उद्‌देश्य

शिक्षा में भी जहर होता है..। सुनकर अजीब लगेगा लेकिन, यह ऐसा ही है जैसे जहर में दवा होती है और दवा में भी विष रहता है। महत्वपूर्ण यह है कि इसका उपयोग कैसे किया जाता है? आज चारों ओर शिक्षा का महत्व है। यह बिल्कुल सही है कि आगे आने वाले वक्त में पढ़े-लिखे ही टिक पाएंगे लेकिन, यह भी जरूरी नहीं है कि पढ़े-लिखे लोग भाग्य अपनी मुट्‌ठी में कर लें। खूब पढ़ने के बाद भी संघर्ष कम नहीं होगा। दरअसल, शिक्षा अगर धनोपार्जन के लिए है तो संघर्ष कभी खत्म नहीं होगा लेकिन, विद्या उपार्जन के लिए है, तो शिक्षा के अर्थ बदल जाएंगे। शिक्षा का उद्‌देश्य है बाहर दो वक्त की रोटी, मान-सम्मान यह सब तो मिले, लेकिन भीतर एक होश जागे, खुद को पहचानने की योग्यता परिष्कृत हो। शिक्षित व्यक्ति इसीलिए अशांत नहीं होना चाहता, क्योंकि अशांत वह होता है जो चीजों का विश्लेषण गलत करता है। अशांत व्यक्ति भूल जाता है कि अशांति बाहर से आती है और शांति आपका मूल स्वभाव है। शिक्षा यही इशारा करती है। आज पढ़ा-लिखा आदमी भोग-विलास जैसे दुर्गुण पाल लेता है और उसकी शिक्षा उसके लिए जहर बन जाती है। प्रयास यह करें कि आपका अध्यापन, आपका विद्यार्थी होना जिं़दगीभर चलता रहे और जब भी अवसर आए, अपने अध्यापक स्वयं बन जाएं। इसमें समझने-समझाने की शक्ति जीवनभर बनी रहेगी, आपकी शिक्षा आपके लिए वरदान साबित होगी। वरना बहुत से लोगों के लिए तो शिक्षा अभिशाप या जहर भी बन सकती है..।


You may also like to buy

Facebook Comments


X