भूख को समझकर जीवन में तृप्ति प्राप्त करें

जीते जी यदि भूख का अर्थ ठीक से समझ लिया तो मृत्यु बड़ी तृप्ति के साथ होगी। इंसान की ज़िंदगी में भूख एक सहज प्रक्रिया है। पशुओं में भी होती है, पर पशु और मनुष्य की भूख समझ के स्तर पर बदल जाती है। इंसान के जीवन में अन्न के अलावा भी कई किस्म की भूख होती है। देह की, धन-पद-प्रतिष्ठा.. इन सबकी भी अलग-अलग ढंग से भूख होती है। कुल-मिलाकर भूख सौदागर बन जाती है। इसकी पूर्ति के लिए क्या-क्या नहीं करता इंसान? अन्न की भूख की बात करें तो दुनिया में हर सेकंड एक मौत इसके कारण हो रही है। यानी जितनी मौतें होती हैं, जितने तरीके से होती है, उनमें से 58 प्रतिशत अन्न की भूख से होती हंै। लेकिन इसके अलावा भी इंसान जीते-जी मरता है और वह भूख चाहे शरीर की हो या धन की, आरंभ होती है कल्पना से। इसका परिणाम तब दिखता है जब प्राप्त हो जाता है। लेकिन प्राप्त होने के बाद ही मामला खत्म नहीं होता भूख का। फिर सवाल खड़ा होता है, आप तृप्त हुए कि अतृप्त रह गए? और इसके बाद फिर मांग शुरू हो जाती है। शरीर की भूख ने तो मनुष्य को पशु बनाकर छोड़ दिया है। पद-प्रतिष्ठा की भूख उसे हिंसक बना देती है। अपराध के पीछे भी भूख ही काम कर रही है। इसलिए अन्न की भूख के अलावा और जितनी भूख आपके शरीर में हैं, उनको थोड़ा समझकर उपयोग कीजिए। अन्न की भूख तो अन्न मिला, खा लिया और काम हो गया, लेकिन ये दूसरी भूख कहीं ऐसा न हो आपको बर्बाद ही कर दे। मेरी पुस्तक “जीने की राह” में ऐसे ही कुछ जीवन में छोटे अपितु महत्वपूर्ण बिंदुओं पर समझाया गया है.


पं. विजयशंकर मेहता द्वारा रचित निम्नलिखित पुस्तकों से भी आप जीवन की किसी भी समस्याओं का समाधान का निदान कर सकतें है:

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