योग को अपनाकर पाखंडी होने से बचें

जीवन में महापुरुष न आया हो तो उसे खोजें

आने वाले वक्त में दो तरह के लोग ज्यादा मिलेंगे- पाखंडी और पागल। इनकी परिभाषा समझना हो तो जिसकी करनी में भीतर और बाहर से भेद होगा वे पाखंडी और जिसकी सोच में भीतर व बाहर से अंतर हो वे पागल। पाखंडी व्यक्ति का सारा रुझान प्रदर्शन में होता है और धीरे-धीरे वह इतना माहिर हो जाता है कि जैसा दिख रहा होता है, भीतर से वैसा होता नहीं है। पाखंड को वह कवच की तरह इस्तेमाल करने लगता है। दुनिया में बहुत से लोग भ्रम में डूबने को तैयार हैं, धोखा खाने को उधार बैठे हैं। पाखंडियों की ऐसे लोगों के साथ जम जाती है। दूसरे किस्म के लोग होंगे पागल। एक सामान्य आदमी और पागल में फर्क यह है कि पागल जो सोच रहा होता है, वह बता नहीं पाता और कभी-कभी उसके सोचने और करने में तालमेल नहीं बैठ पाता।

पागल को संपादन करना आता नहीं तो उसके मन ने जो उछाल ली, वह वैसी की वैसी बाहर फेंक देता है। समझदार आदमी का भी मन तो लगभग पागलों जैसा ही काम करता है, पर बाहर से वह उसको जमा लेता है। ये वो लोग हैं जिन्हें दुनिया मानती नहीं, पर हैं पागल ही। बहुत सारे समझदार लोग भी जो पागल नहीं हैं, करते ऐसा ही हैं। फिर ऐसे ही लोग जब जीवन में कोई चुनौती या समस्या आती है तो तुरंत अवसाद के शिकार हो जाते हैं। बहुत गहराई में जाएं तो डिप्रेशन भी पागलपन का ही रूप है। इन दोनों से बचना हो तो योग के अलावा कोई रास्ता नहीं। थोड़ा समय योग को दीजिए और अपने पाखंडी और पागल होने से खुद को बचाइए।


पं. विजयशंकर मेहता द्वारा रचित निम्नलिखित पुस्तकों से भी आप जीवन की किसी भी समस्याओं का समाधान का निदान कर सकतें है:

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