सेवा के लिए होती है वीआईपी कल्चर

VIP culture in india

ऊपर वाले के दरबार में न कोई बड़ा होता है न कोई छोटा लेकिन, परमात्मा भी एक व्यावहारिक दृष्टि रखता है। आपने देखा होगा जिन मंदिरों में बहुत भीड़ होती है वहां वीआईपी के लिए व्यवस्था अलग से रखी जाती है। व्यवस्थापकों का मानना है सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा करना पड़ता है, लेकिन भगवान इसमें एक बात और सोचता है। हो सकता है वीआईपी को सामान्य व्यक्ति से अधिक काम करना है तो उसके समय का दुरुपयोग न हो। वह जल्दी निपट जाए और फिर अपने सेवाकार्य में लग जाए। यदि ऐसा है तब यह ‘वीआईपी कल्चर’ ठीक है, लेकिन कोई यदि सोचे कि ‘मैं बड़ा आदमी हूं, लाइन में नहीं लगूंगा.., मुझे वीआईपी ट्रीटमेंट दिया जाए तो अहंकार की यह दृष्टि खतरनाक है। भगवान भी वीआईपी को ट्रीटमेंट अलग देते तो हैं। लंका के युद्ध में तुलसीदासजी ने लिखा- महा महा मुखिआ जे पावहिं। ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं।। कहइ बिभीसनु तिन्ह के नामा। देहिं राम तिन्हहू निज धामा।। जिन बड़े-बड़े प्रधान सेनापतियों को वानर पकड़ लेते, उनको प्रभु राम के पास फेंक देते। विभीषण उनके नाम बताते और रामजी उन्हें भी परमधाम भेज देते..। यहां महामुखिया शब्द का अर्थ ही वीआईपी है। रावण की सेना में भी जो वीआईपी रहे होंगे उनको राम की निकटता मिल गई और भगवान थोड़ा विशेष रूप से उनको परम गति दे रहे थे। तो एक व्यवस्था भगवान ने लगा रखी है कि वीआईपी अच्छा हो या बुरा, अपने तरीके से भगवान के पास जल्दी तो पहुंच जाएगा पर उसका निपटारा भगवान कैसे करेंगे, यह वे ही जानते हैं।


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